Thursday, July 14, 2016

अवसाद रोग (Depression) व इसका आयुर्वेद में उपचार

डिप्रेशन या अवसाद एक ऐसी मनो स्थिति जो हर इंसान ने अपने जीवन काल में किसी ना किसी रूप में कभी ना कभी अनुभव की है. और आज के इस तेज़-तर्रार युग में यह रोग सर्दी/ज़ुकाम की तरह हो रहा है. लगभग 10 % जनसंख्या में अवसाद रोग के रूप में पाया जाता है. विपरीत परिस्थितियों में मानसिक तनाव और विषाद महसूस करना तो प्राकृतिक ही है परंतु जब यह मानसिक स्थिति अनियंत्रित एवं दीर्घकालीन बन जाए और मानसिक विकृति बनकर रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित करने लगे तब इसका इलाज करना आवश्यक हो जाता है.


यह रोग सभी उम्र अथवा श्रेणियों ( working, non-working, healthy, diseased) के व्यक्ति में उत्पन्न हो सकता है. और प्रसन्नता का विषय यह है की ये सुसाध्य रोग है. प्रभावशाली उपचार तथा मनोविशलेषन द्वारा यह रोग आसानी से ठीक हो जाता है.

अवसाद के कारण (Causes of Depression in Hindi)

हालाँकि यह रोग अब जनसंख्या में अत्यधिक व्याप्त होता जा रहा है परंतु अभी तक इसके मुख्य कारण के बारे में स्पष्टता नही मिल पाई है. वैज्ञानिक यही मानते हैं की यह रोग मनोवैज्ञानिक, आनुवांशिक और पर्यावरण संबंधी कारणों से उत्पन्न होता है.
कुछ लोगों में जन्म से ही अवसाद का रोग पाया जाता है. उनके मस्तिष्क में प्राकृतिक रसायनों  का असंतुलन रहता है. इसके अलावा दीर्घ रूप से बीमार लोग, वीडियो गेम्स या इंटरनेट का अधिक प्रयोग करने वाले, वे लोग जिनके प्रिय जनो की मृत्यु अथवा उनसे वियोग हो गया है इत्यादि व्यवहारिक कारणों से भी ग्रस्त व्यक्ति में अवसाद का रोग उत्पन्न हो जाता है.
प्रकृति के करीब रहने से इस रोग के होने की संभावना कम हो जाती है.

डिप्रेशन के लक्षण (Symptoms Of Depression in Hindi)

  • आत्महत्या के विचार आना
  • आत्मविश्वास की कमी
  • ख़ालीपन की भावना
  • अपराध भाव से ग्रस्त होना
  • सामाजिक अलगाव और चिड़चिड़ा स्वाभाव
  • निर्णय लेने में असमर्थता
  • बहुत अधिक अथवा बहुत कम सोना

डिप्रेशन का उपचार (Treatment Of Depression Through Ayurveda in Hindi)

इस रोग के इलाज में psychotherapy और दवाई दोनो का ही उपयोग किया जाता है. मामूली अवसाद केवल मनोविशलेषन द्वारा निवृत्त हो जाता है. परंतु गहरे अवसाद का उपचार दवाइयों से किया जाता है. अवसाद-विरोधी दवाइयाँ मस्तिष्क में रसायनिक आसनतुलन को ठीक करती हैं तथा माना जात है इस प्रकार ये अवसाद को डोर कर देती हैं. परंतु आपको जानकार हैरानी होगी की इन दवाइयों के दुष्प्रभाव से रोगी में आत्महत्या के विचार आने लगते हैं या फेर घबराहत के दौरे पद सकते हैं . अन्य भी बहुत से साइड-एफेक्ट्स इन दवाइयों से होते हैं.
परंतु यदि आप आत्मबल को मज़बूत करने की चेष्टा करें तथा आयुर्वेदीय चिकित्सा के मूलभूत सिद्धांतों को समझकर उपचार करें, तो इस रोग से मुक्ति प्राप्त कर स्वास्थ की ओर उन्मुख हुआ जा सकता है.आयुर्वेद में इस रोग को विषाद रोग के नाम से जाना जाता है. इस अवस्था को रोग-उत्तेजक कारक भी कहा जाता है. यह मनोरोग धीरे धीरे शरीर में प्रविष्ट हो व्यक्ति की स्वस्थ, संवेदना, अनुभूति, ग्रहनशीलता, इन सबको प्रभावी करता है. जब विषाद रोग का रूप ले लेता है, तब इसका उपचार करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है.

अवसाद से मुक्त करने वाली आयुर्वेदीय औषधियाँ (Herbs Useful in Treatment Of Depression)

  • अश्वगंधा (Withania somnifera): इस औषधि के प्रभाव से मन में नकारत्मक विचार आने बंद हो जाते हैं. यह तनाव, और शारीरिक कमज़ोरी को डोर करने वाली औषधि है.
  • ब्राहमी (Bacopa monnieri): इसके औषधीय गुणों द्वारा तनाव, अवसाद जैसे मानसिक रोग डोर हो जाते हैं तथा समरन शक्ति का विकास भी होता है. यह औषधि मस्तिष्क के तंतूयों में नवीन उर्जा उत्पन्न कर मानसिक शांति और मनोबल वृद्धि दोनो को बढ़ती है.

  • हल्दी (Curcuma longa): शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों के निवारण हेतु हल्दी एक अद्भुत उपयोगी औषधि है. ख़ास तौर पर इसका प्रयोग ऋतु बदलने के समी पर होने वेल अवसाद में महत्वपूर्ण है.
  • गुदुची (Tinospora cordifolia): यह नवीन उर्जादायक एवं रोग प्रतिकारक क्षमता को बढ़ने वाला औषध जी समरन शक्ति, धृति शक्ति का विकास करता है. यह मंबुद्धिता का निवारण करता है
  • जटामंसी (Nardostachys jatamansi): इस जड़ी-बूई के सेवन से मासिक विश्रान्ति की अनुभूति मिलती है. यह मान में सकारात्मक विचार उत्पन्न कर सही दिशा में इन्हें निर्देशित करता है और अवसाद का निवारण करता है.

विषाद रोग से मुक्ति पाने के कुछ घरेलू नुस्खे (Home Remedies Useful In Depression In Hindi)

  • ४-५ बेर के फल लेकर उनमें से बीज निकल दें तथा गुदा का पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को निचोड़ कर २ चम्मच रस निकाल लें. इसमें आधा चम्मच जयफल मिल लें. इस मिश्रण को आक्ची तरह घोल लें और दिन में दो बार इसका सेवन करें.
  • कुछ काजू लेकर उनका पाउडर बना लें. १ चम्मच पाउडर को ई कप दूध में डालकर इसका सेवन करना चाहिए.
  • २ बड़े चम्मच ब्राहमी और अश्वगंधा के पाउडर को १ गिलास पानी में मिलकर रोज़ इसका सेवन करें.
    रोगी को हर समय किसी सकारात्मक कार्य में व्यस्त रहना चाहिए. इससे मन व्यर्थ की सोच-विचार से बचता है.
  •  व्यक्ति को अनेक प्रकार के सरल कार्य करने को दें. पर्याप्त विश्राम और ध्यान की विधियों द्वारा सकारत्मक उर्जा का निर्माण करें.

Monday, July 4, 2016

एलर्जी अथवा अधिहृषता (Allergy) का आयुर्वेद में उपचार

एलर्जी अथवा अधिहृषता वह स्थिति है जिसमें हमारा प्रतिरक्षी तंत्र (immune system) अत्यंत संवेदनशील हो जाता है और किसी भी साधारण कारक के प्रति अत्यंत तीव्र शारीरिक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है जो रोग का रूप ले लेती है. वसंत ऋतु में होने वाला ‘हे फीवर’ या ‘एकज़ीमा’ अथवा त्वचा पर उठने वाले लाल या सफेद खुजलिनुमा दाने, एलर्जी का ही रूप है.

एलर्जी के कारण (Causes Of Allergies In Hindi)

कई लोग एलर्जी से इतने ग्रस्त हो जाते हैं कि हर वस्तु जैसे छोटा सा धूलकण अथवा कोई पर्फ्यूम (perfume), किसी जानवर का बाल, उन्हें हर चीज़ से एलर्जी हो जाती है. अब तो नौबत इतनी बिगड़ चुकी है कि लोगों को गेहूँ खाने से भी एलर्जी है. यही नही ये तो सब जानते हैं आजकल कुछ बच्चों को जन्म से ही दूध से एलर्जी होती है. इस विषम हालत में व्यक्ति क्या करे? हालाँकि छोटे बच्चों में निम्न स्वास्थ के कारण बहुत अलग हैं और इसका संबंध उसके पैदा होने से पहले माता- पिता के आहार-विहार और माता के गर्भावस्था में शरीर की हालत और जीवनचर्या पर निर्भर करता है. परंतु इस लेख में हम केवल आम तौर पर होने वाली एलर्जी  और उनके आयुर्वेद द्वारा उपचार के बारे में बात करेंगे.
एलर्जी के काई कारक होते हैं. जिस तरह कि पराग, किसी घरेलू अथवा अन्य जानवर का बाल, कोई केमिकल अथवा मानव- रचित रसायन, धूल, कई उपजीवी (parasites) और कई बार मौसम में आए हुए परिवर्तन भी इस रोग के कारक बन जाते हैं.
आयुर्वेद में ‘आम’ (acidic toxins-resulting from undigested food) को ही एलेर्जी का कारक माना जाता है. यह ‘आम’ पक्वाशय से लेकर किसी भी अन्य अंग (ख़ासकर जिनमें पहले से कमज़ोरी हो) में अपना घर बना लेता है. इस कारण इसके द्वारा उत्पन्न रोग और उनके लक्षण भी अनेक प्रकार के होते हैं. आम के कारण विषाक्त होने के कारण रक्त में अथवा पित्त में प्रादुर्भाव प्रकट हो जाते हैं. इसके कारण कफ में भी विकृति अथवा उग्रता उत्पन्न हो सकती है. हर प्रकार के दोष प्रधानता के अनुसार विभिन्न लक्षणों द्वारा एलर्जी उत्पन्न होती है.

एलर्जी के लक्षण (Symptoms Of Allergy In Hindi)

ये तो सर्वविदित सत्य है कि एलर्जी में आम तौर पर जुकाम जैसे ही लक्षण पाए जाते हैं. बहती नाक, गले में खराश, आँखों से पानी आना, त्वचा पर दाने आना- ये सब एलेर्जी में पाया जाता है. कई लोगों में पेचिश, दस्त भी होने लगते हैं और दिल की धड़कन का असंतुलित रूप ले लेती है.
ज़्यादातर ऐसा प्रतीत होता है कि व्यक्ति को नज़ला अथवा ज़ुकाम हो गया है परंतु अधिक गंभीर रूप में दमा, साँस लेने में कष्ट, विभिन्न प्रकार की दर्द, शरीर के कई अंगों में कमज़ोरी, सूजन, दाने आना अन्य लक्षण हैं.

दोष की विकृति एवं एलर्जी (Imbalance of Doshas And Allergy In Hindi)

वास्तव में यह ‘हे फीवर’ एक कफ-पित्त की विकृति द्वारा उत्पन्न हुआ विकार है.
वात के प्रकोप में प्रधान रूप से सिर में दर्द, अनिद्रा और व्यग्रता का अनुभव होता है.
पित्त के प्रकोप में नाक अथवा गले से पीले रंग का श्लेष्मा आत है, आँखों और त्वचा में जलन, बुखार जैसा लगना- ये सब रोगी को प्रतीत होता है. कफ दोष के कुपित होने पर सफेद बलगम बनता है जो शरीर में भारीपन और मंदता के रूप में भी प्रकट होता है. यदि साइनस में अवरोध या रुकावट है तो सिर में इस हिस्सों में हल्के दर्द का अनुभव हो सकता है.

आम उपचार (General Treatment Of Allergy According To Ayurveda In Hindi)

  • नास्य का प्रयोग इन सब स्थितियों में सर्वथा महत्वपूर्ण है. अनु तैल के 3-4 बूँद दोनो नासिका में 2 समय रोज़ डालना अत्यंत लाभकारी है. मुलेठी, बिल्व, अगरु, कंटकारी, नागरमोठ  द्वारा सिद्ध किया हुआ औषधीय तिल तैल का उपयोग भी दोनो नासिका में किया जा सकता है.
  • वात एवं कफ को संतुलन में लाने के लिए यह प्रयोग किया जा सकता है – 20 मिलीग्राम त्रिकटु चूर्ण (सोंठ, पिप्पली, काली मिर्च), 250 मिलीग्राम तुलसी के पत्ते, 10 मिलिग्राम लौंग, कपूर और सूखा धनिया लेकर इनको अच्छी तरह पीसकर मिश्रण बनाएँ. इस मिश्रण का २ ग्राम शहद के साथ रोज़ सेवन करें.

पथ्यापथ्य (Ayurvedic Dietary Guidelines Helpful In Alleviating Allergies In Hindi)

  • गरिष्ट भोजन का सेवन ना करें. पनीर और इससे बने खाद्य पदार्थ, दही कफ को बढ़ाकर जठराग्नि पर दुष्प्रभाव डालते हैं जिस कारण इनका प्रयोग सर्वथा वर्जित है.
  • हल्के एवं सुपाच्य भोजन जैसे लौकी, परवल, मूँग की दाल, दलिया इत्यादि का सेवन हितकर रहता है.

दोष की विकृति के अनुसार औषधि प्रयोग (Home Remedies According to Dosha vitiation In Ayurveda In Hindi)

पित्त का निदान
  • पित्त की विकृति को ठीक करने के लिए निम्न औषधि का प्रयोग किया जा सकता है: मुलेठी, छोटी
    इलायची और चंदन युक्त चाय का प्रयोग करना हितकर है. चाय बनाने के लिए बराबर मात्रा में सूखे मसालों को लेकर उनमें चार गुना पानी मिलाएँ. इस मिश्रण को तब तक उबालिये जब तक ये एक-चौथाई न रह जाए.
  • बेर के सूखे पाउडर को इस्तेमाल करने से भी पित्त का शमन होता है.
  • गरम पानी में यूक्लीपटस के तेल के दो बूँद डालकर उसकी वाष्प लेना अत्यंत हितकर है. नारियल तेल की नास्य दिन में दो बार- एक बार सुबह उठकर और दूसरा रात को सोने से पहले अवश्य लें.
वात का निदान
  • मेथी, अदरक और शहद युक्त औषधि: 2 चम्मच मेथी दाना, 1 लीटर पानी में मिलाएँ और आधे घंटे तक इसे उबाल कर छान लें. 2 चम्मच अदरक का पेस्ट बनाएँ और उसे उसका रस पूरी तरह से निचोड़ लें.
  • इस रस को उबले हुए पानी में मिलाएँ. इसमें एक चम्मच शहद मिलाएँ. इसे अच्छी तरह घोल लें और रोज़ इसका 1 गिलास सेवन करें.
कफ का निदान
    • औषधि: 50 ग्राम कपूर, लौंग और 1 ग्राम तुलसी का सेवन 40 दिन तक करना चाहिए.
    • गिलोय, तुलसी, लौंग का काढ़ा बनाकर उसमें कपूर डालकर 2 हफ्ते तक रोज़ सेवन करना चाहिए.
    • यदि आप किसी योग प्रशिक्षक द्वारा कुंजल क्रिया सीख लें और हर 3-4 दिन बाद इसका अभ्यास करे तो आपको चमत्कारी लाभ देखने को मिलेगा. योग के अनुसार सभी प्रकार के एलेर्जी के कारक वास्तव में हमारे पेट में घर बनाए न होते हैं. कुंजल द्वारा ये स्वतः ही निकल जाते हैं. ना केवल इस क्रिया द्वारा शरीर की शुद्धि होती है अपितु अवसाद और दुखकारी यादें भी मन से निकल जाती हैं. (यदि आपको ग्लकोमा या अधिमंत की दिक्कत है अथवा कोई बड़ा ऑपरेशन हुआ हो तो यह क्रिया नही कर सकते. इन्हें करने के लिए अन्य किसी प्रकार के घातक रोग ना हो, ये अनिवार्य है. योगाचार्य की सलाह लेकर ही छठकर्म का अभ्यास करें.) और यदि जल नेती भी साथ में सीख ली जाए और ठीक से पानी को साइनस से प्राणायाम द्वारा निकाल दिया जाए तो इस प्रकार के रोग सपने में भी नही होंगे. इस क्रिया को करने के बाद यदि देसी गाय के दूध से बने शुद्ध देसी घी अथवा बादाम रोगन या अनु तेल से नास्य लिया जाए तो यह अत्यंत हितकारी है. आपको बहुत जल्द ही स्वस्थता का अनुभव होगा.
      यदि अनुलोम विलोम का नित्य अभ्यास किया जाए तो इस रोग के उपचार को चार गुना ताक़त मिल जाती है. कपालभाति प्राणायाम योग्य आचार्य से सीखकर इसका हर रोज़ अभ्यास करने से श्वसन तंत्र मजबूत हो जाता है.ध्यान रहे यदि ग़लत अभ्यास किया तो स्वस्थ की हानि भी हो सकती है. इसलिए केवल कुशल प्राणायाम के आचार्य से सामने बैठकर सीखें, सोशियल मीडीया से नही.

मुख व्रण या मुँह के छाले (Mouth Ulcers)

मुख व्रण या मुँह के छाले एक आम समस्या है जो विभिन्न कारणों से उत्पन्न हो सकते हैं. ये देखने में छोटे घावदार लाल या सफेद मुख वाले जो किनारों पर सूजन लिए होते हैं. वैसे तो सरलता से ही ठीक हो जाते हैं परंतु कभी-कभी  मुश्किल से ठीक होने वाले बड़े चालों में आयुर्वेदीय औषधियों का प्रयोग किया जाता है. ये विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं:
  • छोटे (2-8 मिली मीटर वर्गाकार के)
  • बड़े: बड़े छाले जो ज़्यादा गहरे तक मुख में घाव बना देते हैं तथा ये ठीक होने पर एक  निशान छोड़ देते हैं.
  • दर्द वाले या बिना दर्द करनेवाले.
  • हरपीस (herpes) के कारण उत्पन्न छाले.
    आयुर्वेद में इस अवस्था को मुख पाक कहा जाता है.
  • मुख व्रण क़ब्ज़ के कारण भी हो सकते है. इस अवस्था में क़ब्ज़ को हटाने से छाले भी सर्वथा ठीक हो जाते हैं.
  • अपच: किसी भी प्रकार की अपच अथवा अजीर्ण से मुख में छालों की समस्या उत्पन्न होती है.
  • विटामिन ब-कॉंप्लेक्स और विटामिन सी की कमी से.
  • कॅल्षियम की कमी के कारण.
  • अत्यधिक मसालेदार भोजन के सेवन से
  • कम पानी पीने के कारण.
    वास्तव में ये शरीर में पित्त के बढ़ जाने से उत्पन्न होते हैं.

    मुख के छालों के लिए आसान प्रयोग (Simple  Home Remedies Useful In Treatment Of Mouth Ulcers In Hindi)

  • धनिया के कुछ पत्तों का पेस्ट बनाकर पानी में घोल लें और इनसे दिन में 3-4 बार गरारे करें.
  • दिन में 2-3 बार कच्चे टमाटर खाएँ या इनका जूस पीजिए.
  • इन पर घी या अनारियल तेल लगाने से ये जल्दी ही ठीक हो जाते हैं.
  • गरम और ठंडे पानी से बारी- बारी से गरारे करने से भी मुख के छालों में बहुत लाभ मिलता है.
  • हल्दी और ग्लिसरीन को मिक्स कर लें और इस पेस्ट को छालों पर लगावें. यह बहुत असरदार प्रयोग है.
  • थोड़ी सी कर्पूर में मीठी कॅंडी पीस लें. ये मिश्रण छालों के उपर लगाएँ.
  • नारियल पानी से गरारे करते हुए इसे दिन में 2-3 बार पीजिए. इससे आश्चर्यजनक लाभ मिलता है.
  • सुबह उठकर केला और दही खाएँ. दिन में गर्म, मसालेदार खाने मत लीजिए.
  • नारियल तेल और शहद के प्रयोग से भी इस दिक्कत में लाभ मिलता है.
  • चाय और कॉफी का सर्वथा त्याग करें.
  • बेर को पीसकर इसे छाले पर लगाएँ.
  • दूध अथवा पानी में 1-1 चम्मच जीरा और धनिया के दाने डालकर तब तक उबालें जब तक की मिश्रण आधा ना रह जाए. इसमें स्वादानुसार शर्करा अथवा गुड मिला लें. इस घोल का सेवन दिन में दो बार करें. इससे अपच से भी निवरत्ति मिलती है.
  • मधु को उंगली पर लगाकर उसे छालों पर लगाने से इनके प्रकोप से राहत मिलती है.
  • आम या अमरूद के नर्म पट्टियों को चबाकर उनका रस मुख में चालों के स्थान पर रखने से तथा इनके सेवन से भी इस ताकलीफ़ से राहत मिलती है. यही प्रयोग अगर जाजी मालीगी के पत्तों द्वारा किया जाए तो अत्यंत फलदायी सिद्ध होता है. इनसे थोड़ी देर के लिए सुन्न्ता का अनुभव होता है परंतु शीघ्र ही आराम आ जाता है.
  • जीरा का आधा चम्मच चबाकर खाने के उपरांत १ गिलास पानी पीजिए. इस प्रयोग से भी चालों में अत्यंत लाभ मिलता है.

  • कुछ आयुर्वेदीय औषधियाँ (Some Ayurvedic Medicines Useful In Treatment Of Mouth Ulcers In Hindi)

    बड़े और मुश्किल से ठीक होने वाले मुख के छालों में उपयोग की जा सकती हैं.
    • गंडूशा धारणा का प्रयोग त्रिफला क्वात के साथ किया जाता है. इस मिश्रण से प्रतिदिन गरारे करने या इस द्रव को मुख में कुछ देर धारण करके रखने से बहुत लाभ मिलता है.
    • त्रिफला चूर्ण को शहद में मिलाकर छालों पर लगाने से आराम मिलता है.
    • खादिराधी वॅटी के प्रयोग से भी ये छाले कम हो जाते हैं और मुख की दुर्गंध भी नष्ट हो जाती है.
    • इसके अलावा मुख को सॉफ करने के बाद 1 चम्मच शुद्ध तेल (नारियल, तिल) जो कोल्ड प्रेस से निकाला गया हो, उसे मुख मे रख कर पूरे मुँह में घुमाएँ ( आयिल पुल्लिंग- Oil -pulling). इस प्रयोग से दाँतों की सभी शिकायतें दूर हो जाती हैं.

Saturday, July 2, 2016

दमा (Asthma) का आयुर्वेदिक उपचार

दमा का प्रकोप विश्व की जनसंख्या पर बढ़ता जा रहा है. रोज़मर्रा उपयोग होने वाली कीटनाशक दवायें इस रोग में अभिवृद्धि कर रही हैं. आयुर्वेद के अनुसार यह रोग इसकी गंभीरता और लक्षणों के हिसाब से पाँच प्रकार का है जो कि तीन तत्वों (वायु, अग्नि, जल) के असंतुलन के कारण उत्पन्न होता है.
  • वायु तत्व के असंतुलन से शुष्क अथवा ड्राइ-टाइप (dry-type) दमा उत्पन्न होता है.
  • अग्नि-तत्व के असंतुलन से संक्रमण अथवा इन्फेक्षन -टाइप (infection-type) दमा उपार्जित होता है. 
  • जल तत्व के असंतुलन से संकुलन अथवा कंजेस्षन-टाइप (congestive-type) दमा उत्पन्न होता है.
ड्राइ-टाइप अस्थमा (Dry-type asthma): यह उन व्यक्तियों में पाया जाता जिनमें त्वचा शुष्क हो, जिनका संगठन पतला और जिनमें क़ब्ज़ की शिकायत पाई जाती है.
इन्फेक्षन-टाइप अस्थमा (Infection-type asthma):  यह पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति जिनमें सराइयसिस (psoriasis) और चर्म रोग की संभावना अधिक होती है तथा जो लोग  में ब्रॉंकाइटिस से ग्रस्त हों, उनमें पाया जाता है.
कंजेस्षन-टाइप अस्थमा (Congestion-type asthma): यह गठीले शरीर वाले लोगों में पाया जाता है जिनकी हड्डियाँ मज़बूत हों अतएव जो सर्दी-खाँसी जल्दी ही प्रभावित हो जाते है और  जिनके शरीर में जल का अवरोधन (water-retention) होने की प्रवृत्ति अधिक होती है.

दमा के लक्षण (Symptoms of Asthma in Hindi)

अस्थमा के लक्षण व्यक्ति की संरचना पर निर्भर करते हैं. यदि इसका इलाज समय पर ना हो तो यह बढ़ जाता है और रोगी को हस्पताल में दाखिल करने की नौबत आ जाती है. इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति को शारीरिक काम करने में दिक्कत अनुभव होती है तथा सामान्य कार्यों को करने में भी असमर्थता का अनुभव होने लगता है. परंतु सामान्यतः दमा में रोगी को साँस लेने में अवरोध महसूस होता है. इस रोग के मुख्य लक्षण हैं की इसमें बार-बार श्वास की क्रिया में दिक्कत उत्पन्न होती है. सीने व अन्य श्वसन तंत्र के अंगों में अचानक जकड़न व संकुलन उत्पन्न हो जाता है. श्वसन तंत्र में यह प्रतिक्रिया प्रायः किसी आलर्जन अथवा ट्रिग्गर (trigger) के कारण होती है.
श्वास की नलिकायों के संकुचन से साँस में घरघराहट होती है. सीने में जकड़न एवं खाँसी का होना दमा के लक्षण हैं

दमा रोग के उपचार के लिए कुछ सरल घरेलू उपाय (Ayurveda Home Remedies For Asthma In Hindi)

  • मेथी, अदरक और शहद युक्त औषधि: 2 चम्मच मेथी दाना, 1 लीटर पानी में मिलाएँ और आधे घंटे तक इसे उबाल कर छान लें. 2 चम्मच अदरक का पेस्ट बनाएँ और उसे उसका रस पूरी तरह से निचोड़ लें.
    इस रस को उबले हुए पानी में मिलाएँ. इसमें एक चम्मच शहद मिलाएँ. इसे अच्छी तरह घोल लें और रोज़ इसका 1 गिलास सेवन करें.

अल्ज़इमर रोग में लाभदायक आयुर्वेदिक प्रयोग

  • पंचकर्म: इस आयुर्वेदीय प्रणाली से शरीर में मौजूद जीव विष (toxins) को बाहर निकाला जाता है. इस क्रिया में पाँच प्रकार से शरीर की शुद्धि एवं मस्तिष्क की कोशिकायों की पुष्टि की जाती है:
    शिरोधाराशिरो बस्तीनास्य( medication via nose),शिरो लेप, निरूहावस्ती (enema to detoxify colon)
शिरोधारा: इस क्रिया में औषधियों से सीधह तेल को एक पात्र द्वारा धारावॅट रोगी के मस्तक पर प्रवाहित किया जाता है. यह मस्तिष्क को पुष्टि देने में सहायक. इस प्रक्रिया से मस्तिष्क में ऑक्सिजन, रक्त तथा ग्लुकोइसे की मात्रा बढ़ती है जिससे नवीन उर्जा क अनिर्माण होता है.
नास्य: इस प्रयोग में औषधि को नाक के माध्यम से दिया जाता है. फलस्वरूप औषधि का विस्तार पूरे मस्तक प्रदेश तथा दिमाग़ में हो जाता है और रोगग्रस्त क्षेत्रों दवाई सीधा असर करती है.
शिरो बस्ती: यह प्रणाली अत्यंत लाभकर है और इसमें एक टोपी के मध्यम से औषधीय तेल को रोगी के मस्तक पर रखा जाता है. यह प्रयोग पारकिनसन रोग (Parkinson’s disease), अधरंग, सेरेब्रल अट्रोफी (cerebral atrophy) में लाभदायक सिद्ध होता है.
शिरो लेप: इस प्रयोग में औषधि का लेप बनाकर रोगी के सिर में लगाया जाता है. यह विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगों का उपचार करने में सहायक विधि है.
  • पौष्टिक भोजन लेना तथा परिपक्व जीवन शैली का निर्वाह करना शरीर और मन दोनो के लिए लाभदायक है. विवेक शक्ति का यथोचित प्रयोग करना और उचित निर्णय के साथ विधायक कर्म करना भी आयुर्वेद की दृष्टि में महत्वपूर्ण कारक हैं. प्राणायाम का अभ्यास ख़ासकर नाड़ी शोधन करने से मस्तिष्क की कोषों में तेजस्विता आती है. प्राणायाम और योगाभ्यास से तंत्रीकेयों पर स्करात्मक प्रभाव पड़ता है तथा जमा जीवववीश भी निष्कासित होतें हैं. श्वास को ठीक प्रकार से लेने से मस्तिष्क में ऑक्सिजन की वृद्धि होती है और रक्त का दौरा भी बढ़त है जिससे ग्लूकोस और पोशाक तत्व दिमाग़ में जाते हैं.
  • अल्ज़इमर रोग में उपयोग होने वाली कुछ जड़ी-बूटियाँ (Herbs Useful for Alzheimer’s Disease in Hindi)

    ब्राहमी (Bacopa monnieri): ब्राहमी की चमत्कारिक गुण से मस्तिष्क में नवीन उर्जा उत्पन्न होती है तथा कोशिकायों को पुष्टि मिलती है. इसका प्रयोग तनाव, घबराहट, चिड़चिड़ेपन, आपसमर, स्मृति को बढ़ाने के लिए तथा बालों को झड़ने से रोकने के लिए.
    ब्राहमी के सेवन से व्यक्ति के मानसिक व बौद्धिक क्षमता में चमत्कारिक वृद्धि होती है. यह तंत्रिकायों को शांत करता है.
    बच (Acorus calamus) : इस जड़ी के प्रयोग तंत्रिका तन्त्र को मज़बूत करता है और स्मृति में वृद्धि लाता है. यह औशद्धि धारणा, और धृति (retention) दोनो को ही मजबूत करती है. इस औषधि का प्रयोग मेध्य रसायन में किया जाता है.

Thursday, June 30, 2016

वृद्धावस्था: कैसे पाएँ एक स्वस्थ वृद्धावस्था

बुढ़ापे के लक्षण हटाने के कुछ बाहरी साधन (Anti-ageing External Topical Applications For Youthful Skin As Per Ayurveda In Hindi)

  • चंदन कि लकड़ी का तेल, रोज़वुड का तेल, इन दोनों कि बराबर मात्रा में लेकर बराबर मात्रा तिल तेल में इन्हें मिश्रित करें. आप चाहें तो बादाम रोगन में भी इन्हें मिश्रित कर सकते हैं. ये झुर्रियों को हटाने का सर्वश्रेष्ठ साधन है.
  • नींबू के रस की कुछ बूँदें मुख पर लगाने अथवा टमाटर का रस मुख पर लगाने से चेहरे कि त्वचा से दाग-धब्बे गायब हो जाते हैं.
  • यदि आलु और टमाटर का रस लगाया जाए तो इससे चेहरा निखर जाता है. सेब का गुदा मुल्तानी मिट्टी में मिलाकर लगाने से भी चेहरे का रंग निखर जाता है.
  • कुछ बादाम कि गिरियाँ को भिगोकर रखें. इन्हें पीसकर मलाई में मिश्रित कर लें और इस मिश्रण को चेहरे पर लगाएँ. इससे चेहरा निखरा त्वचा मुलायम और तनी हुई बनती है.
  • शहद का प्रयोग करने से चेहरे पर नमी बनी रहती है और इससे अनचाहे बालों से भी छुटकारा मिलता है.

**यूरिक एसिड का बढ़ना**

यूरिक एसिड का निर्माण उस समय होता है जब शरीर में प्यूरिन न्यूक्लियटाइड का निर्माण होता है जो कि ग़लत रूप से अपचय(catabolise) होती है. शरीर में यूरिक एसिड के अतिरिक्त मात्रा होने से गठिया तथा अन्य संबंधित रोग उत्पन्न हो जाते हैं.  यह रोग ख़ास तौर पर पैरों के जोड़ों में उत्पन्न होता है.


यूरिक एसिड बढ़ने के लक्षण (Symptoms Of Increased Uric Acid In Hindi)

  • गठिया
  • ज्वर/ बुखार
  • सूजन/ शोथ
  • तीखा सुई के चुभने जैसा दर्द
  • घुटनों में सूजन
  • त्वचा की रंगत का बदलना
  • शरीर के जोड़ों में दर्द और लालिमा

गठिया के कारण ( Causes Of Gout As Per Ayurveda In Hindi)

यह रक्त धातु और वात के कुपित हो जाने के कारण उत्पन्न होता है. गठिया को आयुर्वेद में वातरक्त भी कहा जाता है.
यह रोग खट्टे, तीखे, मसालेदार, तले हुए भोजन का अत्याधिक सेवन करने से, लाल माँस, दिन में सोने, अत्याधिक क्रोध करने से, शरीर में प्राकृतिक वेगॉन को रोकने से, अत्याधिक कामुक व्यवहार के कारण उत्पन्न हो सकता है.

कुछ आसान घरेलू प्रयोग और परहेज़ (Simple Tips For Gout Treatment In Hindi)

यह रसायन अन्य रोगों के होने की स्थिति में भी पाय जाता है. इस रोग से निजात पाने के लिए कुछ सरल से कदम अवश्य उठाएँ:
  • खूब सारा पानी पीजिए
  • मीट, टोफू, मछली, सार्डीन, और अन्य प्रकार का माँस ग्रहण नही करना चाहिए.
  • शतावरी, मशरूम, पालक, सोयाबीन, पनीर, मटर भी नही खाने चाहिए.
  • सेब का जूस मत पीजिए.

मुख की दुर्गंध (Bad Breath or Halitosis)

मुख से आने वाली दुर्गंध व्यक्ति के स्वास्थ और व्यक्तित्व का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है. मुख की दुर्गंध का मुख्य कारण है जिव्हा के पिछले हिस्से में जमा जीवाणु संग्रह. यह बहुत से कारणों की वजह से हो सकता है. परंतु मुख्यतः यह गन्ध युक्त खाने की सेवन की वजह से होता है. इसके अलावा धूम्रपान, मुख सूखने के कारण, किसी प्रकार के रोग, मसूड़ों के फूलने की वजह से या फिर साइनस जैसी तकलीफ़ की वजह से भी हो सकता है. पेट की खराबी और शरीर में अतिरिक्त टॉक्सिन के कारण भी यह समस्या पाई जाती है. मुख की सफाई पर ध्यान देने से इस शिकायत को दूर रखा जा सकता है. मुख की दुर्गंध के साथ पाए जाने वाले अन्य लक्षण हैं मुख में छाले और मसूड़ों में खून का रिसाव. ख़ासकर पेट को सॉफ रखना भी अत्यंत आवश्यक है. इसके लिए त्रिफला का प्रयोग हितकर है. त्रिफला का सेवन ऋतु के अनुसार उचित रूप से ही करना अचाहिए अन्यथा दीर्घ काल तक इसके अनुचित रूप से प्रयोग किए जाने पर गंभीर समस्या पचाशय में आ सकती है.

 गर्मियों में त्रिफला का एक चम्मच के साथ छेवान हिस्सा गुड़ लें. वर्षा ऋतु में पूर्व लिखित मात्रा में ही सेंधा नमक के साथ लीजिए. पतझड़ के मौसम में शकराकारा के साथ सेवन उचित है. हेमंत ऋतु में इसका सेवन सूखे अदरक के साथ करें. शिशिर में यह पिप्पली के साथ सेवन करना चाहिए. वसंत ऋतु में शहद के साथ त्रिफला को लें.

**हाइपरटेन्षन (hypertension)**

हाइपरटेन्षन (hypertension) या उच्च रक्तचाप आज के समय के घातक रोगों में से एक है. इसे आयुर्वेद में ‘रक्त गति वात’ भी कहा जाता है. रक्तचाप की दर व्यक्ति की आयु, शारीरिक एवं मानसिक कार्यशीलता, परिवारिक पृष्ठभूमि तथा उसके खानपान पर निर्भर करती  है. एक स्वस्थ मनुष्य में रक्तचाप की दर 80 मि.मी. डाइयासटोलिक (diastolic) और 120 मि.मी. सिसटोलिक (systolic) होती है.
अनुचित खानपान, अत्यंत गरिष्ठ भोजन का सेवन तथा शारीरिक व्यायाम की कमी उच्च रक्तचाप के प्रमुख कारण हैं. फास्ट फूड, फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक, प्रिज़र्वेटिव्स, इन सब कारणों से शरीर में जीवविष (toxins) प्रविष्ट होते हैं जो कि पाचन क्रिया पर प्रादुर्भाव डालते है. पाचन क्रिया के मंद पड़ने से भोजन से आम(acidic toxin) उत्पन्न होता है जो रक्त में प्लास्मा से संयुक्त होकर साम (Blood+Toxin) का निर्माण कर देता है. ‘साम’ सामान्य रक्त से अधिक घनिष्ट और भारी होता है जिस कारण ये रक्तवाहिनियों के कमज़ोर हिस्सों में जाकर जम जाता है. इस कारण रक्त धमनियों की चौड़ाई कम हो जाती है और रक्त को स्रोतों (channels- arteries) में वहन करने में अवरोध आता है और इस कारण धमनियों में अधिक दबाव या ‘ब्लड प्रेशर’ का निर्माण हो जाता है. मॉडर्न मेडिकल साइंस अब इस बात को स्वीकार रहा की रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों का कारण है चीनी और वेजिटेबल आयिल्स के उपयोग से उत्पन्न धमनियों में जलन और शुष्कता. यह जड़ है इस बीमारी की. सॉट नामक वेबसाइट पर देखिए अँग्रेज़ी में पूरी पोस्ट जिससे आपको प्रमाण भी मिलेगा.
मानसिक तनाव, चिंताग्रस्त रहने से, अधिक सोचने से भी रक्तचाप की दर सामन्य से बढ़ जाती है. बहुत अधिक तला हुआ गरिष्ठ भोजन खाना, चाय-कॉफी का अधिक सेवन, प्रोसेस्ड फूड भी रक्तचाप को बढ़ाने के कारण हैं.
उच्च रक्तचाप को Silent Killer भी कहा जाता है. इस रोग के लक्षणों की सही पहचान करना अत्यंत आवश्यक है और इसका उपचार आयुर्वेद द्वारा संभव है. गर्दन के पीछे के हिस्से में दर्द (occipital headache), घबराहट और कंपकपी महसूस होना, चक्कर आना और बिना काम किए थकान का रहना, उच्च रक्तचाप के प्रमुख लक्षण है.आयुर्वेद अनुसार इस रोग की चिकित्सा में प्रमुख कारण का निवारण करना आवश्यक है. उच्च रक्तचाप तीनों दोषों की विकृति, हृदय तथा रक्त धमनियाँ में उत्पन्न विकार से होता है. रक्त धमनियों में वयान वायु की गड़बड़ी के लक्षण पाए जाते हैं. इसलिए उपचार में इन सब लक्षणों पर ध्यान दिया जाना चाहिए.

उपचार विधि (Line Of Treatment For Hypertension In Hindi)

आयुर्वेद अनुसार इस रोग की चिकित्सा में प्रमुख कारण का निवारण करना आवश्यक है. उच्च रक्तचाप तीन दोषों की विकृति, हृदय तथा रक्त धमनियाँ सबको प्रभावित करता है. रक्त धमनियों में वयान वायु की गड़बड़ी के लक्षण पाए जाते हैं. पित्त की विकृति भी इस रोग का प्रमुख कारण है. पित्त और वात प्रकृति के व्यक्ति जिनमें इन दोषों के विकृत होने की संभावना बनती है, उन लोगों में उच्च रक्तचाप होने की संभावना दूसरों से अधिक होती है. इस रोग के समूल नाश के लिए चिकित्सक सर्वप्रथम पाचन क्रिया को सुगठित करने की औषधि देते हैं. साथ ही साथ पूर्व में बढ़े हुए जीव विष (toxins) को शरीर से निकालना भी आवश्यक हैंं. मानसिक तनाव को घटाने के लिए, ध्यान, प्राणायाम को करना भी चिकित्सा का अंग है.

जीवनशैली और खानपान संबंधित सुझाव (Lifestyle And Food Habits For Prevention And Treatment Of Hypertension In Hindi)

  • माँस, अंडे, नमक, अचार, चाय, कॉफी का प्रयोग निम्न मात्रा में करना चाहिए.
  • धूम्रपान और शराब का सेवन नही करना चाहिए.
  • प्रोटीन और वसा युक्त भोजन का सेवन कम-से-कम रखना और सब्जी, फल आदि की मात्रा भोजन में बढ़ाना हितकर है.
  • लहसुन, अमला, नींबू, चकोतरा, मौसमी, तरबूज़, बिना मलाई का दूध, और कॉटेज चीज़ का प्रयोग करने से रोगी को लाभ मिलता है. भोजन हल्का और सुपाच्य होना चाहिए.
  • किसी एक विशिष्ट पद्धति द्वारा किए जाने वाला व्यायाम, जैसे कि जॉगिंग (jogging), तैरना या फुर्ती से की गयी नियमित सैर (brisk walking) को भी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए.
  • अगर संभव हो तो किसी समझदार योग सलाहकार द्वारा सीख कर अधोमुखश्वानसन, उत्तानसन, पश्चिमोत्तासन, हलासन, सेतु-बँध सर्वंगासन, इन सबका अभ्यास करने से विशेष लाभ होता है.

  • लाभदायक घरेलू औषधियाँ (Home Remedies For Treatment of Hypertension In Hindi)

    •  3 से 4 लहसुन लौंग, 10-12 तुलसी के पत्ते लेकर इनका रस निकाल लें और एक-चौथाई गिलास गेहूँ के जवारे के रस के साथ मिलकर रोज़ सेवन करें.
    • 1 छोटे चम्मच प्याज़ के रस में बराबर मात्रा में शहद मिलकर एक हफ्ते तक सेवन करें. यदि लाभ मिले तो इस प्रयोग को कुछ और दिन तक जारी रखें.
    • लस्सी में एक छोटा चम्मच लहसुन का पेस्ट बनाकर दिन में दो बार लें.
    • 10 ग्राम तरबूज के बीजों को भूनकर उन्हें पीस लें. इस पाउडर को 2 कप पानी में 10 से 15 मिनिट तक उबालें. प्राप्त मिक्स्चर को छान कर सेवन करें. यह प्रयोग रोज़ करें.
    • त्रिफला का रोज़ रात्रि में सेवन और एक चम्मच मेथी दाना रात को भिगो कर रखने के बाद प्रातः काल उसका सेवन करना चाहिए.

    • उच्च रक्तचाप में लाभकारी औषधियाँ (Herbs Useful For Treatment Of Hypertension In Hindi)

      • सर्पगन्ध ( Rauwolfia serpentina): एक ऐसी बूटी है जिसे सदियों से उच्च रक्तचाप के उपचार में प्रयोग किया गया है. रसगंधा नामक औषधि जिसमें शूतशेखर, जटामांसी और सर्पगन्ध प्रयोग होते हैं, इस व्याधि के निराकरण में अत्यंत उपयोगी है.
      • अर्जुन (Terminalia arjuna): शोथ द्वारा ये नतीजे पाये गयें हैं की यह अँग्रेज़ी चिकित्सा में प्रयोग होने वाली Beta-blocker दवाइयाँ की तरह ही अपना कार्य करती है. इसके साथ-साथ यह औषधि, जिगर  तथा हृदय की रक्षाकारक भी है.
      • गोक्शूरा (Tribulus terrestris): यह औषधि भी रोगनिवारक है तथा इसकी कार्यपद्धति ACE Inhibitors के समान है.

      पंचकर्म चिकित्सा द्वारा उच्च रक्तचाप का उपचार (Panchakarma Chikitsa For Treatment Of Hypertension In Hindi)

      निरूह बस्ती चिकित्सा यदि किसी समझदार वैद्य द्वारा करवाई जाए तो इस रोग के उपचार में बहुत लाभ देती है. इसी प्रकार धारा चिकित्सा भी ज़िद्दी रोग के उपचार में लाभदायक है. दुग्ध तथा बाला द्वारा सिद्ध किए हुए तैल को रोगी के मस्तक पर डाल जाता है. इस विधि को चिकित्सक की देखरेख में किया जाना चाहिए और ये चमत्कारिक प्रभाव देती है.

      दोष प्रधानता के अनुरूप रोग निवारण ( Treatment According to Dosha Vitiation In Hindi)

      यदि वात दोष के प्रादुर्भाव का कारण मुख्य रूप से रोग का कारण है तो चिंता, तनाव , अधिक सोचने, पढ़ने, लिखने से रोग में अभिवृद्धि पाई जाती है.
      इस अवस्था में रोग-निवारण हेतु रोगी के मनोरोग का उपचार प्रमुख रूप से किया जाता है.
      • वात उपचार: 125 मिलीग्राम सरपगंध और जटामंसी को 2.5 माह तक दिन में तीन बार लेना चाहिए.
      • लहसुन का एक लौंग शहद के साथ रोज़ लेने से भी इसमें फायदा मिलता है.
      • सारस्वत पाउडर भी इस रोग के उपचार में लाभदायक है.
      • अश्वगंधा से बनी हुई औषधि मिश्रण का सेवन करना चाहिए.
        नोट: ये प्रयोग आयुर्वेदचार्य से निरीक्षण के अंतर्गत ही करने चाहिए. लिखे हुए उपाय इस रोग के उपचार में आयुर्वेद की कारगरता को दर्शाते हैं परंतु वास्तविक उपचार चिकित्सकीय परामर्श द्वारा ही करें.
      पित्त की विकृति द्वार उत्पन्न रोग में रोगी को अधिक क्रोध आता है, चिड़चिड़ापन, नकसीर फूटना, भयंकर सरदर्द, आँखों का चौधियाना, इन सब लक्षों को पाया जाता है.
      • पित्त को शांत करने वाले औषधियों का सेवन करने से इस अवस्था में राहत मिलती है. 250 मिलीग्राम ब्राहमी का सेवन रोज़ रात्रि मेी करना चाहिए.
      • इसके अलावा ब्राहमी रसायन या सारस्वत पाउडर का प्रयोग भी लाभप्रद है.
      • सर्वा (Indian sarsaparilla) का 15 दिन तक सेवन भी पित्त को शांत करता है.
        नोट: ये प्रयोग आयुर्वेदचार्य से निरीक्षण के अंतर्गत ही करने चाहिए. लिखे हुए उपाय इस रोग के उपचार में आयुर्वेद की कारगरता को दर्शाते हैं परंतु वास्तविक उपचार चिकित्सकीय परामर्श द्वारा ही करें.
      कफ की प्रधानता से उत्पन्न होने वाले रोग में व्यक्ति को हल्का सरदर्द, आलस्य, प्रमाद, हाथ-पाँव का फूलना उच्च रक्तचाप के सहित पाए जाते हैं.
      • इस अवस्था में रोग के निराकरण के लिए 1 ग्राम गुग्गुलु अथवा अर्जुन का दिन में दो बार सेवन करना चाहिए.
      • 250 ग्राम शिलाजीत दिन में तीन माह के लिए दिन में तीन बार लाभप्रद है.
      • रक्त धमनियों को साफ़ करने के लिए 1 ग्राम त्रिफला गुग्गूल का 3 महीने के लिए उपयोग फ़ायदेमंद है.
      • इस अवस्था में यदि 100 मिलीग्राम एलाईची और दालचीनी का प्रयोग दिन में 3 बार 3 महीने तक किया तो लाभदायक सिद्ध होता है.
        नोट: ये प्रयोग आयुर्वेदचार्य से निरीक्षण के अंतर्गत ही करने चाहिए. लिखे हुए उपाय इस रोग के उपचार में आयुर्वेद की कारगरता को दर्शाते हैं परंतु वास्तविक उपचार चिकित्सकीय परामर्श द्वारा ही करें.
        नोट: सभी प्रयोगों में रक्तचाप की नियमित जाँच एवं आयुर्वेदचार्य की सलाह और निरीक्षण  उसके लाभ की दर को मापने के लिए बहुत आवश्यक है.

**आयुर्वेद**

आयुर्वेद का अर्थ है वह ज्ञान जिससे आयुष अथवा जीवन को विस्तार मिलता है. आयुर्वेद वह शास्त्र है जो भारत के समृद्ध औषधीय और चिकित्सीय संपदा का गोचर है. दुर्भाग्यवश हम अपनी ही धरोहर में मिले इस विज्ञान को भूलते जा रहे हैं जिसके प्रयोग से जीवन ना सिर्फ़ रोग मुक्त किया जाता है अपितु अप्रतिम रूप से स्वास्थ्य की ओर संचालित भी  किया जा सकता है.

आयुर्वेद प्राचीन भारत में चिकित्सा की प्रयोग की जाने वाली पद्धति है जिसमें रोग का निवारण जड़ से किया जाता है. इस विद्या का प्रयोग भारत के ऋषि-मुनि एवं ज्ञानियों द्वारा 2000 से 5000 वर्ष पूर्व किया जाता था. यह चिकित्सा प्रणाली वास्तव में modern medicine से ग़ूढ और अधिक प्रभावशाली है क्योंकि इसमे रोग के वास्तविक कारण का निवारण किया जाता है. शरीर में स्वास्थ का निर्माण कर यह चिकित्सा प्रणाली अनियमित जीवन शैली से उत्पन्न अनेक रोगों को सफलता पूर्वक निवृत्त करती है. आयुर्वेद के अनुसार मन और शरीर दोनों आपस में जुड़े हुए हैं. मन में उत्पन्न दोषों से ही शरीर में व्याधि प्रगट होती है तथा शारीरिक रोगों के निवारण के लिए मानसिक स्वास्थ का विशेष महत्व आयुर्वेद में निर्धारित है.